एक कथा बाबा काल भैरव जी की……  
   
Writter:- सुन्दर लाल जी…  
Type:- लेख   Date:- 6/4/2015 1
Description:- देव भूमी उत्तराखण्ड पर ये पहला लेख है जो की आपको उत्तराखण्ड की अदभुत लोक संस्कृती से अवगत करायेगा। ये लेख बाबा काल भैरव जी की उत्तराखण्ड मे अत्यनत मान्यता और उनके अदभुत चमत्कार का वर्णन है। जो की एक सत्य घटना पर आधारित है परंतु कुछ कारणों से व्यक्ति विशेष और स्थान के नाम बदल दिये गये है। ये घटना उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले की ही है परंतु गॉव का नाम बदल दियागया है। उमीद है आप लोगो को ये लेख पसंद आयेगा। धन्यवाद …. जय बाबा काल भैरवा ।
 
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  आज हम आप सभी को उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिला ले के चलते है। ये जगह उत्तराखण्ड के कुमाऊ मण्डल के तीर्थ स्थान भी कही जाती है। यहॉ पे सरयू नदी और गोमती नदी के संगम होने के कारण भी बागेश्वर का अपना विशेष महत्व है। ये ही नहीं यहा पे शिव जी के बाघ रुप मे विचरण करने के कारण यहा पर बाघनाथ के नाम से शिव जी का मंदिर भी है। और प्राचीन काल के ऋषी मारकण्डेय जी ने भी यहा कयी वर्ष तक तप किया है।

इन सभी कारणो से बागेश्वर धाम आने वाले लोगो की भीड़ हमेशा बनी रहती है। बागेश्वर धाम की अपनी अलग महीमा और महत्व है। पर आज हम आपको उत्तराखण्ड के बारे में कुछ विशेष बताने जा रहे है।

उत्तराखण्ड की संस्कृती जितनी भिन्न है उतनी ही अनजान भी है। सबसे ज्यादा अनोखा और अदृभुत यहा भगवान की पूजा करने का तरीका है। यहा पूजे जाने वाले देवता भी विशेष है और उनकी कथा भी रोचक और अदृभुत है। यहा के कुछ देवता जैसे गोलू महाराज और बाबा गंगनाथ जी की कथा हम अपनी वेग साईट पे पहले प्रकाशित कर चुके है। पर आज हम आपको उत्तराखण्ड के बहूत विशेष देवता बाबा काल भैरव जी के बारे मे बताने जा रहे है। काल भैरव जी के बारे मे शिव पुराण मे पढ़ने को मिलता है। और माता शति के शक्ति पीठो की रक्षा का कार्य भी काल भैरव के अलग अलग रूपो को दिया गया है।

उत्तराखण्ड मे भी लोग बाबा काल भैरव जी की पूजा करते है। परंतु ये कहना मुश्कलि है की वो काल भैरव जी के कौन से रूप की पूजा करते है। क्योकी शिव जी ही एक मात्र ऐसे देवता है जिनकी पूजा करने के बहुत से भिन्न भिन्न तरीके है जो की भिन्न भिन्न लोगो द्वारा अपनाये जाते है। कुछ तो लोगो को पता है और हो सकता है और भी बहुत से तरीके हो । क्यूकि आप सभी जानते है शिव जी तो अनंनत है और उनकी कथी भी अननत है। जिसे जानना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। और बिना ज्ञान कुछ कहना भी उचित नहीं है।

हमारा मकसद केवल उत्तराखण्ड की संस्कृती के बारे मे आप सबको बताना है। अगर आप को इस लेख मे कोई त्रुटी लगे तो हमें जरूर बतार्इएगा । हम आप के जरीये अपने लेख को त्रुटी मुक्त जरूर करना चाहेगें । चलिए अब हम अपनी कथा पे आते है।

ये कथा उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिला के एक छोटे से गॉव की है। जहा एक परीवार अपने पूरे परीवार के साथ बहूत खुशहाली से रह रहा था। एक पती़-पत्नी और उनके दो बच्चे। जैसा की उत्तराखण्ड मे आज भी लोगो का मुख्य व्यवसाय खेती ही है। वैसे ही इस परीवार का मुखिया जिसका नाम शुखिया है वो भी दिन रात अपने खेतो मे अपने पत्नी हरूली के साथ मेहनत कर के अपने परीवार का लालन पालन करते थे। इतना तो वो दोनो कमा ही लेते थे की उनके पास कोई कमि न थी। घर मे दूध के लिए एक भैस और खेती के लिए दो बैल भी थे। और उनो दोनो बच्चे भी अच्छे थे। एक बड़ा लड़का हरू और छोटी बेटी परूली । संतोष दशवी मे तो परूली अभी पाचवी मे थी। सब कुछ अच्छा चलरहा था और पूरा परीवार खुशी से अपना जीवन गुजार रहा था।

एक दिन की सुबहा जब हरूली दूध दूने के लिए भैस के तबेले मे गयी। उत्तराखण्ड मे गाय और भैस के लिए बने तबेले को गुवाड़ कहा जाता है। और गुवाड़ अपने तहने वाले घर से दूर ही होते है। पर वहा जनवरो की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है। उत्तराखण्ड मे पशु को भी धन ही समझा जाता है और पशू की खूब सेवा की जाती है। पर जब आज सुबह हरुली ने दूध दूने के लिए भैस के पास गयी तो भैस ने उसे पास ही नही आने दिया। हरूली अपने घर की पली इतनी पुरानी भैस के एैसे व्यवहार पर चिंता मे आगयी और क्रोध मे आके भैस की जम के पिटाई भी करदी। बड़ी मशकिल से भैस के पास गयी तो देखा की भैस के थन मे तो बूंद भर भी दूध नहीं है। पहले तो उसे लमा शायद भैस के बच्चे ले पिलिया होगा पर भैस का बच्चा तो अभी भी दूर बंधा हुआ था और भूक के मारे चिल्ला रहा था। हरूली को कुछ समझ नहीं आया तो वो आज खाली बर्तन ही ले के वापस आ गयी।

घर आते ही हरूली शुखिया पर चिल्लाने लगती है पता नहीं रात को आके किसने हमारी भैस दूली आज तो भैस ने एक बूंद दूध नहीं दिया ये देखो खाली बर्तन ही लायी हू मै। शुखिया कहता है तो चिल्ला क्यू रही हो सायद भैस बिमार होगी शाम को फिर भैस लगा के देख लेना।

हरूली – क्यू न चिल्लाउू एक तो मै अकेली जाती हू दूध दूने। पता है आज कितना परेशान किया भैस ने मुझे। बड़ी मुशकिल से अपने थन पे हाथ लगाने दिया । और अब भैस के बच्चे को क्या खिनाओ गे वो भी तो भूख से चिल्ला रहा है। जाने क्या हो गया मेरी इतनी प्यारी भैस को।

शुखिया – हॉ, भैस तो बड़ी सीधी ही थी रोज ही तो तू अकेली दूने जाती है और कभी कोई परेशानी नहीं की उसने। सायद कोई बात है। पर तुम चिन्ता नही करो। और खेत पर चलने की तैचारी करो आज बहूत काम है। मै भैस के बच्चे को थोड़ा आटे को पानी मे घोल के पिला देता हु कुछ तो पेट मे जायगा उसके। फिर शाम को देखेगें भैस को, ठीक है। चलो खेत मे ही मिलते है। इतना कहके खुशिया और हरूली दोना अपने अपने काम मे चले जाते है। और शाम को थक हार के वापस घर आते है।

हरूली – चलो पहने भैस को दू आते है फिर चुलहा जलाती हू वरना अंधेरा जादा हो जायगा।
शुखिया - जरा बड़ा बर्तन ले लो तूम सुबहा दूध नहीं दिया है तो सायद अब वो ज्यादा दूध दे रोज से।

हरूली – पहले वो दूध तो दे । सुबहा जैसा किया था भैस ने, मुझे अभी भी उसका दूध देना मुशकिल ही लगता है। और अगर ज्यादा दे गी भी तो आप उसके बच्चे को पिला देना सारा दूध। बेचारा सुबह से भूका ही होगा वो।

शुखिया - अरे तूम चिन्ता नहीं करो दूध देगी भैस। जनवर है कभी कभी हो जता है। वैसे बच्चे को सुबहा आटा, पानी मे घोल के पिलाया था। तो भूका तो नहीं होगा ।

शुखिया और हरूली वहा पहुचते है तो भैस का बच्चा उन्हें देखके चिल्लाने लगता है। शुखिया और हरूली समझ जाते है की बच्चे को भूक लगयी है। हरूली जल्दी से जा के बच्चे को खोल देती है जिससे वो खुद भैस के पास जके दूध पिसके। पर भैस उसे पास ही नही आने देती है। बच्चे के बार बार प्रयास करने पर भी उसे लात मारके दूध पिने नहीं देती है। और गुस्से मे उसे माने भी भी जाती है। यह देख के शुख्यिा कहता है तुम बच्चे को बान्ध दो आज मै दूघ दूता है । हरूली जल्दी से भैस के बच्चे के बान्ध देती है।

जैसे ही शुखिया बर्तन ले के दूध दूने को बैठता है। भैस उसे जोर दार सिंगह मारने की कोशिश करती है। पर शुखिया बच जाता है।

हरूली - तुम रहने दो मै ही दू के देखती हू तुम को चोट लग जाये गी। रोज की आदत जों नहीं है तुम को दूध दूने की। शुखिया भी बर्तन हरूली को दे देता है। और आगे आके भैस को डराने की कोशिश करता है। दोनो ही भैस के अचानक बदले हुए व्यवहार से आश्चर्य चकित थे।

हरूली भी भैस को इतने गुस्से मे देख के थोड़ी डरी हूई सी थी पर उसने हिम्मत करके फिर से कोशिश की। पर इस बार भी भैस ने उसे पास नहीं आने दिया। उनकी समझ मे कुछ नहीं आ नहीं आ रहा था। तभी बाहर कुछ जोर से गिरने की आवज हुइ। दोनो बाहर आ के देखते है। तो कुछ भी नहीं मिलता है।

वो फिर से अंदर जाने को होते है तो ग्वाड़ का दरवाजा अपने आप जोर से बंद होजाता है। उन दोनो को लगता है हवा से बंद हो गया होगा। वो दोनो अन्दर जाने के लिए दरवाजा खोलने की कोशिश करते है पर दरवाजा नहीं खुल्ता है। दोनो थक के थेड़ी देर रुक जाते है।

तब तक बहुत अंधेरा भी हो चुका था। उन्हें घर भी जाना था। चारो और सन्नाटा छा जाता है। तभी दरवाजा अपने आप तेजी से खुल जाता है। ये देख के शुखिया और हरूली दोनो डर जाते है। पर फिर भी हिम्मत करके अंदर जाने को तैयार होते है। तभि अंदर से आवज आती है “ चले जाओ यहा से “ और दरवाजा फिर जोर से बंद होता है। अब तो शुखिया और हरूली दोनो सीधे घर को चल देते है। दोनो डर की वजह से कुछ भी नहीं बोलते है और भाग के सीधे घर आ जाते है। घर आ के शुखिया कहता है। देखो रात का समय है अभी खाना बनाओ और खाके सो जाते है सुबहा ही कुछ सोचते है। बच्चो को नही बताना ये सब वो डरेगें वरना।

शुखिया और हरूली चुप-चाप रात का खाना खा के सो जाते है दिन भर के काम से थके हूए जो थे दोनो। इतना डरे होने के बाद भी वो नींद मे खो गये सायद ये सोच के की कल सुबहा उनके लिए नया दिन लाये और आज का दिन एक बुरा सपने की तरह गुजर जाय। पर शायद सुबहा उनकी उठने का इंतजार कर रही थी।

सुबह हरूली रोज की तरह सबसे पहले उठी । उसे सूबह घर का काम जल्दि खत्म कर के खेत पे जो जाना होता था। पर जैसे हरूली रसाई मे गयी उसकी ऑखे खुली की खुली रह गयी । उसे कुछ समझ नहीं आया तो वो जोर से चिल्लायी “ सुनते हो, जरा जल्दि तो आना यहॉ ” हरूली की आवज सुन के शुखिया नींद से जागता है। और दौड़ के रसोई की ओर भागता है। वो भी रासाई की हालत देख के सोच मे पड़ जाता है।

रसोई का सारा समान जमीन पर पड़ा होता है। सारे बर्तन और खाने का समान सब जमीन मे फैला देख के दोनो एक दूसरे को देखते है और पुछते है ये सब कैसे हुआ। और हूआ तो हमे पता कैसे नहीं चला। रसोई उनके कमरे से दूर भी तो नही है। और अगर कोई चोर आया होता तो। कुछ ले के भी जाता सब इस तरह से फैला के बरबाद करके तो नहीं जाता। तभी उनके बच्चे भी आ जाते है। वो पूछते है की ये सब कैसे हो गया। तो हरूली कह देती है शायद रात को बिल्ली बन्द हो गयी थी रसोई में। वरना बच्चे डर जाते तो उन्हें सम्भालना मुशकिल होजाता।

शुखिया ने हरूली को देखते हुए कहता है कुछ गड़ढड़ जरूर है। हमे कुछ करना पड़ेगा। पता नहीं भगवान किस गलती की सजा दे रहे है हमें।

हरूली़ - तुम जा के मौसी को बताओ ये सब वो सबसे बुजर्ग है गॉव मे वो शायद कुछ बता सके हमें।

शुखिया – ठीक हे। तूम ये सब सम्भालो और खेत पे आराम से देर में आना तबतक मै ही खेत पे जाता हू वो काम भी जरूरी है। वहॉ से आते हुए मौसी से मीलता आउूगां। तुम चिन्ता नहीं करो सब ठीक हो जायगा।

दोनो के कुछ समझ तो नहीं आ रहा था। पर एक दूसरे की हीम्मत बन्ने की कोशिशकर रहे थे। शुखिया का खेत के काम मे मन तो नहीं लग रहा था। पर खेती नहीं करेगा तो वो खायेगा क्या। उत्तराखण्ड में आज भी लोगो का मुख्य व्यवसाय खेती ही है। भले खेती कम होती है पर सबकी जीविका का ये ही आधार है। हरुली जैसे ही घर का काम पूरा करके खेत पे आती है शुखिया मौसी से मिलने के लिए चल देता है। क्यूकी वो जानता था बाकी का खेत का काम हरूली कर लेगी। वैसे भी उत्तराखण्ड में महिलाये ही खेती का ज्यादातर काम करती है। पुरूष भी साथ देते है पर महिला का योगदान ज्यादा होता है।

शुखिया मौसी के यह पहुच के अपना हाल सुनाता है। मौसी जी भी उसकी बाते सुन के डर जाती है । उन्हें भी कुछ समझ नहीं आता है। बहुत सोच के कहती है। देख शुखिया ये बात तो बहुत गमभीर है और मै भी ज्यादा कुछ नहीं जानती इस बारे मे पर हमारे पड़ोस के गॉव मे एक परीवार रहता है नदी के पास सुना है उनकी छोटी बहु पुछ करती है तुम उसके पास जाओ और अपनी समस्या सुनाओ सायद वो कार्इ हल बता दे। और अभी दिन भी बचा है तुम शाम होते होते घर भी पहुच जाओगे। इतना सुनते ही शुखिया तुरंत उस गॉव को चल देता है।

उत्तरखण्ड मे कुछ लोग होते है जिन्हें ये आशिर्वाद होता है कि वो लोगो के कष्ट कारण देख सके। मै ऐसा इस लिए नही कह रहा हु क्यूकी मै भी उत्तराखण्ड का रहना वाला हू । और मै ये भी जानता हू बहुत से लोग इस तरह से लोगो को बेवकूफ बनाके फयदा उठाते है। पर बुरे लोग तो कहीं भी हो सकते है। पर उत्तरखण्ड मे कुछ लोगो पर उनके ईष्ट देव की कृपा होती है जिसके वजहा से वे लोगो के कष्ट को देख वा उसका हल बताने मे समर्थय होते है।

शुखिया जैसे ही पडोस के गॉव पहुचता है वहा के कुछ लोग उसे पहचान लेते है और उस से उसकी समस्या पर बात करते है और उसकी समस्या जान के खुद उसे नदी के किनारे वाले घर पर ले के जाते है। उस घर की छोटी बहू उस समय खेत पर गयी होती है पर जब घर वाले शुखिया की समस्या सुनते है तो बहू को खेतसे बलाने के लिए बुलावा भेज देते है। तब तक शुखिया को सभी हिमत बन्धाते है।

जैसे ही छोटी बहू आती है वो शुखिया के अनुरोध पर उसकी समस्या सुनने को तैयार हो जाती है। सारी बात सुनने के बाद ध्यान लगा के कहती है। मुझे तो ये तुमहारे धर के बूडे़ बुजर्ग जो मर गये है वो तुम से खुश नहीं है। शायद तुम अपना कोई वादा पूरा नहीं कर पाये जो तुमने कभी अपने बूडे़ बुजुर्ग को किया हो। तुम अपने बूड़े बुजुर्गो की आत्मा की शातिं का पाठ करवा लो। हो सकता है तुम्हारे पूरवजों की कोई इच्छा अधूरी रह गयी है। देखना पूजा के बाद तुम्हे इस समस्या से आरम जरूर मिल जायेगा।

वैसे एैसा नहीं है की पूछ करने पर हमेशा हमे सही ही उपाय मिले। इस लिए कुछ लोग इसे सही नहीं मानते। पर मै कहना चहता हू की जो भी होता है वो कही ना कही भगवान की मरजी से ही होता है। इस लिए कर्इ बार सब कुछ सही होने पर भी समाधान नही मिलता ।

शुखिया घर आ के सारी बात अपनी पत्नी को बताता है। उसकी पत्नी भी शाम को ही अपने गॉव के ब्रहम्ण को अगले दिन अपने यहा कथा करने का आमंत्रण दे आती है।

अगले दिन पूरा परीवार पूरे मन से कथा और दान धर्म का काम पूर्ण करते है और अपने बूढ़े बुजर्ग से अपनी अनजानी गलती की छमा मांगते है। पूरा दिन इसी मे गुजर जाता है। रात को दोनो पती पत्नी अब सब कुछ सही हो गया सोच के आराम से सो जाते है। मगर सायद होना तो कुछ और ही था।

सुबह जब हरूली उठ कर रसोई मे जाती है । फिर से रसोई का सारा समान फैला देख के हैरान हो जाती है। हरूली समझ जाती है अभी समस्या का समाधान नहीं हुआ है और शुखिया के पास जा के जोर जोर से रोने लगती है। तभी उनका बेटा उठ जाता है और आख फैला के भारी आवज मे कहता है अभी भी तुम्हारी समझ मे नहीं आया क्या?

हरूली और शखिया अपने बेटे के इस व्यवहार से डर जाते है। डरते हूए कहते है कौन हो तुम? जो हमें परेशान कर रहे हो। इतना कहते ही उनका बेटा बेहोश होकर गिर पड़ता है। शखिया तुरंत उठ के अपने बेटे को सम्भालता है। शखिया अपने बेटे को अपने हातो से सम्भालता ही है इतने मे उसकी बेटी उठ के चिल्लाने लगती है। सब भूल गये क्या तुम ? चले जाओ यहा सेǃ चले जाओ यहा से।

हरूली और शुखिया चुपचाप अपनी बेटी की बात सुन रहे थे। कुछ करने की हालत मे तो वो वैसे भी नहीं थे। तभी शुखिया कहता है हम नहीं रहेंगे यहा चलो यहा से। इतना सुनते ही उनकी बेटी भी बेहोश हो जाती है। हरुली अपनी बेटी को उठाती है हरुली और शुखिया दोनो अपने बच्चो को ले के घर के बाहर आ जाते है।

जैसे ही वे बाहर आते है वैसे ही घर के सारे खिड़की और दरवजे जोर से बंद हो जाते है। ये सब देख के हरूली और शुखिया के पैरो तले जैसे जमिन ही गायब हो गयी हो। दोनो डर जाते है और अपने ईष्ट देव को याद करते है की उनसे कौन सी गलती हो गयी जो उनके साथ ऐसा हो रहा है।

जब कुछ समझ नहीं आया तो शुखिया ने हरूली को कुछदिन मौसी जी के यहा ही रहने का सुझाव दिया। हरूली भी अपने बच्चो को ऐसी जगहा नहीं रखना चहती थी इसलिए वो भी मान जाती है और दोनो अपने बच्चो को लेके अपनी मौसी जी के यहा रहने चल देते है।

हरूली का घर भी गॉव के घरो से थोड़ा दूर था। जैसे की उत्तराखण्ड के गॉव मे होता है। कुछ घर तो साथ मे होते है पर कुछ लोग अपना घर अलग भी बनाते है जहा उनके कुछ खेत भी पास में और जानवर रखने केलिए भी जगहा हो जाय। इसलिए कुछ घर गॉव से जरा हट के होते है शुखिया का घर भी थोड़ा गॉव के घरो से दूर होने पर जरूरत पड़ने पर पड़ोस के लोग भी नहीं सहायता को जल्दि नहीं आ सकते थे। इसलिए उनका मौसी के यहा जाना ही सहीं था।

मौसी जी शखिया को इतनी रात पूरे परीवार के साथ आया देख के उन्हें समझ ने मे ज्यादा देर नहीं लगी। उन्होंने दोनो बच्चो को खाना खिला के सुलादियाफिर शुखिया से पूछा अब आगे क्या सोचा है?

शुखिया और हरूली एक दूसरे को देख कर कहते है हम क्या कहे मौसी जी आप ही कोई हल सोचो हमारे कुछ समझ मे नहीं आ रहा है। मौसी जी कहते है देखो न तुम कुछ जानते हो और न मै तुम एैसा करो अपने घर के ईष्ट देवताओ की जागर लगवाओ । अब वो ही कोई रास्ता दिखायेगें।

शुखिया – मगर मौसी जी जब हम अपने घर मे रह नहीं पा रहे है तो जागर कैसे लग सकती है हमारे घर में।

मौसी जी – थोड़ा धैर्य रखो और हिमत से काम लो। जागर करने मैं तुम अकेले थोड़े होगे गॉव के और भी लोग होंगे साथ में । इसलिए तुमहें डरने की जरूरत नहीं है। क्यूकी कोई न कोई गलती तुम से जरूर हुई है भले अनजाने मे हुई हो। वरना इतना सब कुछ नहीं होता बेटा तुम्हारे साथ।

हरूली – जो भी हो मौसी जी पर हमारे बच्चो को हमारे किये की सजा मिलना तो ठीक नहीं है ना। हम अपनी हर गलती के लिए माफी मांगने को तैयार है पर हमें एैसे परेशान करने का क्या मतलब बनता है।

मौसी जी- चालो अभी तुम सब थोड़ आराम करो वैसी भी सुबह तो होने ही वाली है। सुबहा उठ के सबसे पहने जगरी को बुलाने चलेजाना ।

शुखिया- ठीक है मौसी जी आप भी आराम करो अब । हमारी वजहा से आपको भी परेशानी हो रही है।

मौसी जी – अरे तुम हमारे बेटे हो तुम्हारा परीवार कष्ट मे होगा तो हमे भी तो कष्ट होगा न। चलो अब आरम करो देखना कल सब ठीक हो जायेगा।

इतना कह के सब सो जाते है। सुबहा होते ही शुखिया जगरी को लेने चला जाता है। और रात को जागर की तैयारी की सारी व्यवस्था पूरी करता है।

जो पाठक उत्तराखण्ड के होगें उन्हें तो जागर का मतलब पता होगा पर जो पाठक उत्तराखण्ड के रहने वाले नहीं है उनके लिए जागर शब्द थोड़ा नया जरूर होगा। इसलिए हम थोड़ जागर के बारे मे आप सबको बताने का प्रयास जरूर करते है। वैसे जागर को सही मे समझना तो तभी सम्भव है जब आप खुद किसी जागर मे शामिल हो पर फिर भी हम अपने समझ से कुछ बात कहना चाहेगें।

जागर शब्द बहुत हद तक जागरण से मिलता हुआ ही है। और अर्थ भी दोनो का एक ही है। जागर मे भी हम अपने देवी देवता की पूजा सारी रात जाग के करते है जैसा की जागरण में। परंतु उत्तराखडं को देव भूमी कहा जता है उत्तराखंड के कण कण मे वहा के क्षेत्रीय देवी देवता का प्रभाव देखने को मिलता है जिसे वहा के स्थानिय लोग अपनी संस्कृति और रीति रिवाज से पूजते है।

उत्तराखंड के स्थानीय देवी देवता मे विविधता के कारण उनकी पूजा की विधी भी विशेष होती है जिसे हम जागर कहते है। अगर जागरण और जागर मे हम अनतर करना चाहे तो मेरी समझ से दोनो पूजा की विधी को आप एैसे विविध कह सकते हो। जागर मे देवता और भक्त दोनो अपनी बात रखते है पर जागरण में केवल भक्त ही अपनी प्रार्थना भगवान के सम्मुख रखता है। वैसे पूजा की विधी कोई भी हो हर पूजा का एक ही लक्ष्य होता है भक्त का अपने देवता से जुड़ना। जो की पूजा की हर विधी सम्भव बनाती है। तभी तो भक्त उस विधी का चयन करता है। हर क्षेत्र की अपनी विवेषता होती है और देव भूमी की पूजा विधी उसकी अपनी अलग विवेषता है। चलिए अब हम अपनी कथा पे आते है।

रात को सभी लोग शुखिया के घर पर एकत्र हो जाते है। शुखिया और हरूली ने भी सारी तैयारी कर रखी होती है । जगरी दवारा जागर भी समय से शुरू हो जाती है। जागर मे घर के ईष्ट देवता शुखिया को एक पुरानी धटना याद दिलाते है। जब शुखिया का छोटा भाई मोहन एक वर्ष शहर से काम करने के बाद अपने परीवार के साथ वापस गॉव आया था। घर आते ही शुखिया के छोटे भाई मोहन ने अपने बड़े भाई से अपने दिये हुए गहने वापस मांगे।

जो उसने शहर जाते समय अपने बड़े भाई को उन्हें सम्भाल के रखने के लिए दिये थे। पर जब मोहन ने शुखिया से अपने गहने मांगे तो शुखिया ने उसे ये कह के घर से बाहर निकाल दिया था की उसे मोहन ने शहर जाते समय कोई गहने नहीं दिये थे। बल्कि जो भी गहने को घर के बटवारे मे मोहन को दिये गये थे। वो भी मोहन ने बेंच के पैसे ले के शहर कमाने के लिए चला गया था।

ये ही नहीं उस समय शुखिया ने अपने छोटे भाई को सभी गॉव वालो के सामने झूठा कह के अपमानित भी किया था। अपने हुए अपमान को मोहन सहन नहीं कर पाया और उसने बाबा काल भैरव जी के मंदिर मे जा के उनका आवाहन कर के उन्हें इन्साफ करने के लिए विनती की। और अब उसकी विनती को सुनते हुए स्वयं बाबा काल भैरव जी तुम्हें दण्ड देने के लिए आये है। अभी भी तुम्हे कोई जान माल की हानी नहीं हुई है पर आगर तुमने अभी भी अपनी गलती स्वीकार नहीं की तो और भी नुकसान हो सकता है।

ये सब सुन के शुखिया और उसकी पत्नी हरूली देवता से माफी मांगते है और कहते है हे ईष्ट देवता मुझसे गल्ती हो गयी। मै धन के लालच मे आ गया था। पर अब में समझ गया हू मैने अपने छोटे भाई के साथ बहूत अन्याय किया है। मैं वचन देता हू की मै उसका सारा धन उसे वपस कर दुंगा और अपने व्यवहार के लिये छमा भी मामूंगा। हे ईष्ट देवता मेरी गलती की सजा मेरे परीवार को नहीं देना। गलती मेरी है। और इस तरह जागर समाप्त हो जाती है।

अपनी गलती का अहसास होने के बाद शुखिया अपने छोटे भाई के पास जा के उस से अपने किये व्यवहार के लिए माफी मगंता है। मोहन भी अपने भाई को गले लगा लेता है। दोनो ही भाई अपने मन मुटाव को दूर करके आपस मे मिल के बाबा काल भैरव जी को पूजा देते है। शुखिया पूजा मे मोहन के दवारा दिया गया सारा गैहना वापस देता है पर मोहन कहता है भाई मुझे गैहने नहीं चाहिए।

मैने तो बाबा काल भैरव से बस इतना कहा था की। मेरे बड़े भाई ने मुझे सब के सामने झूठा सबित कर दिया है। बस मै तो इतना ही चहता था की आप एक बार सब के सामने ये कह दे की मैने कोई झूट नहीं कहा। और आपने वो मान लिया है तो अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। अंत मे दोनो अपनी मरजी से सारे गहने बाबा काल भैरव जी के मंदिर मे श्रदृा से चढ़ा देते है। बाबा काल भैरव जी दोनो की पूजा से खुश हो के उनहें शुखी से जीवन व्यापन करने का आशिर्वाद देते है। उसके बाद दोनो भाई फिर से साथ साथ खुशी से रहने लगते है। बाबा काल भैरव जी की महिमा उत्तराखण्ड मे चारो ओर प्रसिद्ध है। एैसी हजारो कथायऐं उत्तराखण्ड मे सुनायी जाती है।

ये लेख सच्ची घटना पर आधारित है पर लोगो के व्यक्ति विशेष के सम्मान को ध्यान मे रखते हुए । हमने पात्रो के नाम वो स्थान के नाम बदल दिये है। अगर फिर भी किसी व्यक्ति विशेष या जाती धर्म के लेगो को आपत्ती हो तो हमे जरूर संदेश लिखे। हम आप सभी के विचारो का सम्मान करेगें। आप संदेश हमे हमारी र्इमेल आईडी पे भेज सकते है । हमारी ईमेल आईडी है apnikahaniweb@gmail.com हमे आप सभी के ईमेल का इंतजार रहेगा। हमे एैसी और भी कथाऐ आप के लिए लाते रहेगें तब तक के लिए हमें इजाजत दीजिये धन्यवाद।
……………………. जय बाबा काल भैरवा । …………………..
 
 

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