राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा


Writer:- सुन्दर जी Total page:-   12
Type:- प्रेम कहानी Page no.:- 10
Date:- 7/7/2016 1    
Description:- राजूला मालूशाही उत्तराखण्ड की प्रशिद्ध प्राचीन प्रेम कथा है। जिसे उत्तराखण्ड की कुमाँउनी और गढ़वाली भाषा के लोक गीतो में गाया जाता है। उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास को अपने में संजोय, ये कथा उत्तराखण्ड का हृदय है। यह कथा उत्तराखण्ड के बैराठ राज्य के कत्यूरी राज वंश के राजा मालूशाही और भोट राज्य के धनी व्यापारी सुनपती शौक्य की पुत्री राजूला शौक की अमर प्रेम कथा है। जिसे युगों युगों तक याद किया जायगा। किस तरहा से एक स्त्री ने अपना पती व्रता धर्म निभाया। और कैसे एक राजा ने अपने प्रेम के लिए राज्य पाठ त्याग के योगी बन जंगल जंगल विचिरण किया। आप सभी का स्वागत है इस रोचक प्रेम कथा में।


Page Number - 10

रानी धर्मा देवी ने योगी राज को भोजन अपने हाथो से लगाया और उन्हें भोजन ग्रहण करने का अनुरोध किया। योगी राज भोजन के लिए बैठ गये। और जैसे ही भोजन प्रारम्भ किया माता ने कहा- पूत्र तुमने मेरी बात नहीं मानी और और आज योगी का रूप धारण करके मेरे पास आये हो। मैं तुम्हारी इस साधना को विफल नहीं करूगीं परंतु अपना ध्यान रखना और राजूला को जल्दी वापस ले के आना। मेरा आशिर्वाद तुम्हारे साथ है।

ये सुन के राजा खुश हो गये। परंतु उन के मन में एक प्रश्न आया। राजा ने कहा- हे माता इस योगी कि वेश भूषा में तो मुझे कोई पहचान नहीं सका। परंतु आप ने कैसे पहचाना मुझे। माता मुस्कुराई और बोली बेटा पूरे राज्य में एक तुम ही हो जो पंच ग्रासी है।

राजा अपने भोजन करने से पहले भोजन के पाँच हिस्से करते थे। जो की एक ईश्वर , आकाश, पितृ, गुरू और जीव के लिए छोड़ देते थे। और पाचवा ग्रास का ही सेवन करते थे। इसलिए भोजन करने से उनकी माता को पता चल गया।

यह सुन कर मालूशाही अपनी माता के चरण स्पर्श कर के दक्षिणा ले कर अपने गूरू के पास आता है। बाबा गोरखनाथ कहते है। जाओ इसी वेश भूषा में अपनी राजूला के पास जा कर भिक्षा ले कर उसका हाल समाचार लो। और फिर स्थिती के अनुसान सेना के साथ आक्रमण कर के यूद्ध में विजय हाशिल करना । मेरा आशिर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है।

राजा मालूशाही नौं लाख(9,00,000) सैनीको के साथ भोट राज्य की ओर चल देता है। गुरू गोरखनाथ की आज्ञा के अनुसार राजा मालूशाही पहले योगी का भेष धर के सुनपति शौक के घर राजूला से मिलने जाता है।

मालूशाही जब राजूला के घर पहुचता है। तो उस समय राजूला उदास मन से कबूतरो को दाना डाल रही होती है। वहा पर राजूला के बहुत से सेवक भी थे। यह देख मालूशाही कहता है भीक्षा मिलेगी देवी। राजूला योगी राज के देखती है और अपनी सेविका से कहती है जाओ योगी राज को भीक्षा दे दो। खतरे को देखते हुए मालूशाही राजूला को अपनी सच्चाई सबके सामने नहीं बता सकता था। जब सेविका मालूशाही को भिक्षा देने आती है। मालूशाही भिक्षा लेने से मना करदेता है।

सेविका कहती है क्या हुआ योगी राज। मालूशाही कहता है। देवी मैं ने भिक्षा जिससे मांगी है उसी के हाथ से भिक्षा ग्रहण करता हू और उसे ही आर्शिवाद देता हू। राजूला पास में ही थी यह सुनकर राजूला कहती है। हे योगी राज मेरा भाग्य मुझे पहले ही पता है मुझे अब भाग्य से कुछ नही चाहिये।

यह सुन कर मालूशाही कहता है। हे देवी यू मायूश नही होते हो सकता है मेरे आर्शिरवाद से वो शीर्ध्र आ जाये जिसका तूम इतंजार कर ही हो। यह सुनकर राजूला को कुछ शक होता है। राजूला मालूशाही के पास आ कर कहती है। वो कैसे संभव है ।

योगी राज कहते है। देवी दुनिया में सबकुछ सम्भव है। अगर तुम मूझे भोजन कराओगी तो तुम भी समझ जाओगी। मालूशाही जानता था। जिस तरह मेरी माँ ने मुझे भोजन करते हुए पहचान लिया था । वैसे ही शायद राजूला भी मुझे भोजन करते हुए पहचान जाय।

राजूला मालूशाही के लिए ये भी कर के देख लेना चाहती है और जल्दी से अपने हाथों से योगी राज को भोजन कराने का लिए खुद ही भोजन तैयार करती है। योगी राज तब तक अच्छे से उसके घर का परीक्षण कर लेते है।

राजूला भोजन परोस कर योगी राज को बुलाती है। और जैसे ही योगी राज भोजन ग्रहण करना शुरू करते है। राजूला खुशी से चौक जाती है। और धीरे स्वर में कहती है। आप तो राजा मालूशाही है। यह सुन कर योगी राज धीरे से कहते है हा, और आप को लेने के लिए ही आया हू। परन्तु जब तक मै आप को लेजाने की योजना नहीं बना लेता हू। आप किसी को ये पता नही चलने देना।

राजूला खुशी से झूम उठती है उसे लगता है भगवान बागनाथ ने उसकी सुन ली। वो अपने सेवको से कहती है योगी राज कुछ दिन यही रहेगें इनके रहने का प्रबंध किया जाय। सेवक कहते है परंतु बिना मालिक के आज्ञा के इनके रहने का प्रबधं करना उचित नही होगा। हमे मालिक के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है।

राजूला कहती है आप इनके रहने का प्रबधं करे हम पिता जी से आज्ञा ले के आते है। इस पर राजूला अपने पिता से उस योगी को कुछ दिन रोकने का आग्रह करती है। योगी राज की बात सुन कर सुनपति शौक भी अपनी पूत्री की बात मान लेता है।

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राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा
 

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