राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा


Writer:- सुन्दर जी Total page:-   12
Type:- प्रेम कहानी Page no.:- 11
Date:- 7/7/2016 1    
Description:- राजूला मालूशाही उत्तराखण्ड की प्रशिद्ध प्राचीन प्रेम कथा है। जिसे उत्तराखण्ड की कुमाँउनी और गढ़वाली भाषा के लोक गीतो में गाया जाता है। उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास को अपने में संजोय, ये कथा उत्तराखण्ड का हृदय है। यह कथा उत्तराखण्ड के बैराठ राज्य के कत्यूरी राज वंश के राजा मालूशाही और भोट राज्य के धनी व्यापारी सुनपती शौक्य की पुत्री राजूला शौक की अमर प्रेम कथा है। जिसे युगों युगों तक याद किया जायगा। किस तरहा से एक स्त्री ने अपना पती व्रता धर्म निभाया। और कैसे एक राजा ने अपने प्रेम के लिए राज्य पाठ त्याग के योगी बन जंगल जंगल विचिरण किया। आप सभी का स्वागत है इस रोचक प्रेम कथा में।


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राजूला कहती है आप इनके रहने का प्रबधं करे हम पिता जी से आज्ञा ले के आते है। इस पर राजूला अपने पिता से उस योगी को कुछ दिन रोकने का आग्रह करती है। योगी राज की बात सुन कर सुनपति शौक भी अपनी पूत्री की बात मान लेता है।

राजूला रोज खुद मालूशाही के लिए भोजन बनाती और खुद ही मालूशाही को अपने हाथो से खिलाती। यह सब देख कर सुनपती शौक को लगता है राजूला योगी राज की सेवा कर उन्हें प्रसन्न कर उन का आर्शिवाद लेना चाहती है। इसलिए सुनपती शौक भी निश्चिन्त हो जाता है। और कुछ दिन ऐसा ही चलता रहता है। मालूशाही भी अच्छे से शहर की व्यवस्था देखकर योजना बानाता है।

परंतु एक दिन राज सुनपती शौक किसी कार्य से रात्री को योगी राज के कक्ष से समीप से गूजरते है तो उसे राजूला इतनी रात को भी योगी राज के पास क्यों है यह सोचकर। उसने अपने सेवको से योगी राज की निगरानी करने को कहा। जल्द ही सेवको ने सुनपती शौक को योगी राज की सच्चाई बता दी। मालीक ये योगी वास्तव मे योगी नही है। ये तो बैराठ राज्य का राजा मालूशाही है जो आपकी पूत्री से प्रेम करता है और आपकी पूत्री को ले जाने आया है। उसके साथ उसकी नौं लाख अजय सेना भी आयी है।

यह सुन कर सुनपती शौक घबरा जाता है। वो अपने सेवको से योगी राज पर नजर रखने को कहता है। और कहता है किसी को पता नहीं चलना चाहिए की हमें सब पता चल चुका है। सेवक वैसा ही करते है। सुनपती शौक जानता था की वो मालूशाही का सामना नहीं कर पायेगा। इसलिए वो भोट के राजा को पत्र लिख कर पूरी सेना के साथ आने का आग्रह करता है।

जल्द ही भोट का राजा भी अपनी सेना लेके वहा पहुच जाता है। यह देख कर मालूशाही भी अपनी सेना को युद्ध का आदेश दे देता है। पूरे 10 दिन का युद्ध के बाद मालूशाही विजयी हो जाता है। जिसमें भोट का राजा समझ जाता है इतनी बड़ी सेना से लड़ पाना संभव नही है। वह सुनपती को समझाता है की लड़ने से कुछ हासिल नहीं होगा। दूसरी कोई यूक्ति लगानी पड़ेगी। वह भोट के राजा को राजूला और मालूशाही के विवाह के लिए राजी हो जाने का पारामर्श देता है।

सुनपति शौक्य ये घोष्णा कर देता है कि वह राजूला और मालूशाही के विवाह के लिए तैयार है। जिसे सुनकर राजूला और मालूशाही दोनो खुश हो जाते है। शहर में विवाह की तैयारी शुरू हो जाती है। सुनपती शौक्य विवाह के अवशर पर पूरी सेना के भोजन का प्रबन्ध करता है। और सेना के भोजन से बिष मिला देता है।

परंतु अपने हुए नुकशान के क्रोध मे भोट का राजा राजूला और मालूशाही के भोजन में भी बिष मिला देता है। जैसे ही राजूला मालूशाही भोजन ग्रहण करते है वैसे ही पूरी सेना भी भोजन करना शुरू कर देती है। और विष के कारण धीरे धीरे सभी गिरने लगते है, तड़पने लगते है।

नौलाखा कत्यूर कणी, विष देय गौछा ।
हंसी उड़ी गोछा रामा, कदु लाश पड़ी रैंछा।।

राजूला को भी बिष से आधात देख मालूशाही कहता है। ये तो तुम्हारी पुत्री है इसे बिष क्यु दे दिया। भोट का राजा कहता है राजूला को बिष मैने दिया है। जो मुझे नही मिली वो मै किसी और की कैसे होने दे सकता हू। तब मालूशाही कहता है, मेरी माँ ने कहा था वह मत जा, वहा का बिष मेरी जान ले लेगा। पर मैने अपने मां की बात नहीं मानी।

कामयाब हई गयी भोटयु की चाल।
कत्यूरू दगड़ भाई बुरौ रचौ जाल।।

उधर बैराठ में मालूशाही की माता धर्मा देवी को स्वप्न में मालूशाही की मृत्यू देखी जिससे विचलित होकर धर्मादेवी ने मालूशाही के मामा को गूरू गोरखनाथ जी के साथ बची पूरी सेना ले कर जाने को कहा। उधर मालूशाही और राजूला दोनो बिष से अचेत होकर गिर पड़े।

कुछ ही समय में मालूशाही के मामा उनके गूरू गोरखनाथ जी के साथ वह पहुच गये। उन्होंने अपनी सेना को भोट के राजा को परास्थ कर के भोट पर अधिकार कर लिया। और गूरू गोरखनाथ ने अपनी विध्या का प्रयोग कर राजूला और मालूशाही को बिष प्रभाव से बचा लिया। जय हो बाबा गूरूगोरखनाथ जी की।

गूरू गोरखनाथ जी ने ही पूरे उत्तराखण्ड में पूजा व्यवस्था की नीव रखी है। गुरू गोरखनाथ ही नाथ व्यवस्था के जनक माने जातै है। परंतु उस दिन नौं लाख वीर कत्यूरों की हत्या हूई। तभी से ये वीर नौ लाख कत्यूरों की पूजा की जाती है। अपने भक्तों पे दयाल नौ लाख भगवान कृपाँ कर उनके कष्टों से निदान दिलाते है। हमारी ओर से भी सभी नौ लाख कत्यूरों को हाथ जोड़ कर नमन।

मालूशाही राजूला, अपने मामा और गुरू गोरखनाथ के साथ बैराठ आ गये। जहाँ मालूशाही की माता धर्मा देवी ने अपनी पुत्र के आने की खुशी में पूरे राज्य में उत्सव का ऐलान कर दिया। इस तरह राजूला और मालूशाही अपने बैराठ राज्य में हसी खुशी रहने लगे।

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राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा
 

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