यह कैसी तलाक.....


Writer:- संजीव शेखर जी Total page:-   2
Type:- कविता Page no.:- 2
Date:- 8/22/2017    
Description:- प्रारंभ से हीं तलाक के अधिकतर फैसले समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों, रुढ़ी परंपरावादी सोच आदि की उपज रहा है आज भी अधिक्तर फैसले इसी से प्रभावित हो कर लिए जा रहे हैं। वर्तमान में इसके प्रयोग से हमारे समाज की धूरी( महिलाऔ) में असंतोष, क्षुब्दा व घुटन जैसी स्थिति पैदा हो रही है, दूसरी तरफ दूसरा पक्ष(पुरुष) इसे अपना मौलिक व धार्मिक अधिकार बताते नहीं थक रहे। हमारा यह लेख भी ऐसी ही एक महिला साज़िया पर आधारित है।


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घुटन और खुन्नस के कारण सोहराब साज़िया को अपने गावैं छोड़ आया। वह कभी-कभार साल-छः महीने में ही घर आता-जाता। कुछ दिन ऐसे हीं चलता रहा। इन दूरियों के कारण दोनों के रिश्ते में थोड़ी नर्मता जरूर आई, पर अब ससुराल वाले भी साज़िया को प्रताड़ित करने लगे थे। अक्सर वे उसके साथ मार-पीट व गाली-गलौच करते थे। हर एक गलती पर भद्दी-भद्दी गालियाँ और ताने अब उसे चाय-नाश्ते की तरह मिलने लगा था। बेटा न दे पाने की दंश भूगत रही साज़ीया अपने मन को बहलाने और खुद को इस परिवेश से दूर रखने के लिए शहर के ही एक प्राईवेट अस्पताल में नर्स की नौकरी करनी चाही, पर परिवार वालों की धमकी व दबाव के चलते यह इरादा भी उसे छोड़ना पड़ा।



कुछ दिन के बाद सोहराब ने फोन कर साज़िया को बताया, कि वह यहाँ की नौकरी छोड़ कर दोस्तो के साथ साऊदी अरब जा रहा है, जहाँ पर उसे कुछ डॉक्टरों के रिसर्च टीम को लीड करने का आफर मिला है। यह सब कुछ सुनकर सिर्फ सिसक पान हीं उसके बस में था। साज़िया ने अपनी रिप्रिगनेंसी की बात बतानी चाही, फिर सोचा कोई फायदा नहीं....।
साज़िया की रिप्रेगनेंसी की बात परिवार वालो को पता चला, उनकी उम्मीदें एक बार फिर जग गई।


उन्हे लगा शायद इस बार लड़का हो...। उन्हों ने मुल्ला-मौलवि जी से नियाज वगैरह कई विधि विधान करवाए, मजारों पर चादर-पोशी करई, टोने-टोटके किये, कुछ दिन ऐसे बीत ते रहे, जैसे साज़िया के पुराने दिन वापस आ गए हों।


इन खुशी के पलों में भी साज़िया को एक भय हमेश लगा रहता, कि अगर फिर एकबार बेटी हो गयी तो क्या होगा …? आखरी दिन साज़िया को एक सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया गया। साज़िया भी अल्लाह से दुआ कर रही थी, कि “ सभी की इच्छा पूरी हो जाये। ” पर अल्लाह ने उनके जीवन के लिए कुछ और ही सोच रखी थी। साज़िया ने एक बार फिर एक लड़की को हीं जन्म दिया। ससुराल वाले यह खबर सुनते ही नाक बौहें सिकोड़ने लगे और अस्पताल में ही उसे गाली गलौच करने लगे।


उसी वक्त सोहराब को फोन पर इसकी सूचना दी गई सोहराब ने साज़िया सो फोन देने को कहा, फिर फोन पर ही सोहराब ने साज़िया को एक ऐसा फैसला सुलाया, जिससे आज का पढ़ा-लिखा वर्ग सर्मसार हो गया। उसने फोन पर हीं साज़िया को तीन बार “ तलाक-तलाक-तलाक ” कह कर उससे सभी रिश्ते-नातों से पल्ला झाड़ ली।


साज़िया यह सुन कर अवाक रह गई, जौसे काटो तो खून नहीं। ससुराल वाले उसे अस्पताल में हीं यह कहते हुए छोड़ गए कि तुम्हारे लिए हमारे घर का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया। अब हमारा-तुम्हारा कोई संबंध नहीं। साज़िया के आँखों के सामने सिर्फ अँधेरा रह गया उन्हें सिर्फ तीनों बेटियां दिखाई दे रही थी। इसमें उसका क्या कुसूर था..?


साज़िया के सामने जिन्दगी की विशाल अट्टालिकाएँ नजर आ रही थी। कुछ देर में अस्पताल से डिस्चार्ज स्लिप मिल गयी, बच्चे घर जाने की ज़िद कर रहे थ, पर साज़िया उनसे क्या कहे ? बस आँसुऔं की धार बहा रही थी...............।।




प्रिय पाठकों एवं मित्रों, मेरा उद्देश्य, मेरी इस कहानी के माध्यम से देश मे समाज के हर वर्गों तक साज़िया जैसी हजारों महिलाऔं के दर्द एवं आवाजों को पहुँचाना मात्र है। किसी विशेष र्धम या जाती में ही नहीं बल्की समाज के हर र्धम वा जाती में पुरुष और स्त्री को समान अधिकार प्राप्त होना ही चाहिए।


मेरा मानना है कि जिस प्रकार शादी या निक़ाह दो परिवारों की आपसी सहमती से एवं रिस्तेदारों व परिचतों की मौजूदगी मैं होती है, उसी तरह तलाक के लिए भी ऐसी ही परंपरएँ होनी चाहिए साथ हीं सिर्फ संजीदा विषयों पर ही इसकी कानूनी सहमती हो, जिसमें दोनो पक्ष एक जैसे सहमत हों।

आप अपने विचार मुझ तक मेरे ईमेल आईडी पर ईमेल भेज कर पहुचा सकते है। मुझे आपके ईमेल का इन्तजार रहेगा। मेरी ईमेल आईडी है- sanjeevarya2891@gmail.com ।। धन्यवाद.....

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यह कैसी तलाक.....
 

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