राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा


Writer:- सुन्दर जी Total page:-   12
Type:- प्रेम कहानी Page no.:- 4
Date:- 7/7/2016 1    
Description:- राजूला मालूशाही उत्तराखण्ड की प्रशिद्ध प्राचीन प्रेम कथा है। जिसे उत्तराखण्ड की कुमाँउनी और गढ़वाली भाषा के लोक गीतो में गाया जाता है। उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास को अपने में संजोय, ये कथा उत्तराखण्ड का हृदय है। यह कथा उत्तराखण्ड के बैराठ राज्य के कत्यूरी राज वंश के राजा मालूशाही और भोट राज्य के धनी व्यापारी सुनपती शौक्य की पुत्री राजूला शौक की अमर प्रेम कथा है। जिसे युगों युगों तक याद किया जायगा। किस तरहा से एक स्त्री ने अपना पती व्रता धर्म निभाया। और कैसे एक राजा ने अपने प्रेम के लिए राज्य पाठ त्याग के योगी बन जंगल जंगल विचिरण किया। आप सभी का स्वागत है इस रोचक प्रेम कथा में।


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व्यपारी सुनपति शौक पुत्री के चहरे पर अशंकाओ को देख के चिंतित होता है परंतु वो अपनी पुत्री को अपने से दूर नहीं करना चाहता था।

इधर राजा मालूशाही भी अपने राज्य और रानीयों के बीच धुट रहे थे। इसलीए राजा मालूशाही भी अपने आप को व्यथ रखने के लिए शिकार खेलने को निकल जाते है। और उधर राजूला भी धर से निकलने के लिए अपने पिता से व्यापार के लिए जाते समय खुद भी उनके साथ आने की जिदृद करने लगी।

पिता सुनपति शौक अपनी पु़त्री को समझाता है – हे पुत्री मुझे व्यापार के लिए दूर दूर राज्यों में जाना पड़ता है तुम मार्ग की कठनाईयों को सह नहीं पाओगी। पर राजूला कहा मानने वाली थी। थक हार के सुनपतिशौक अपनी पुत्री को अपने साथ ले जाता है।

राजूला भी बहुत धैर्यवान और हर विपत्ती का सामना करने मे सक्षम थी। अपने पिता के साथ उनके व्यापार मे उनकी सहायता भी करने लगी। ये सब देख के सुनपती शौक को बहुत प्रशंनता हुई।

इसी तरह एक बार भगवान की महिमा से सुनपति शौक अपनी पुत्री के साथ व्यपार करने का लिए बैरठ राज्य के शहर चौखुटिया पहुचा। शहर चौखुटिया के पश्चिम राम-गंगा नदी के तट पर अपना डेरा डाला। और खुद सुनपति शौक रोज बैराठ राज्य में व्यपार करने के लिए जाते। और राजूला व्यापार के लिए लाए मवेशी जैसे भेड़, बकरी और गायों को चारा कराने के लिए वही राम-गंगा के तट पर उनके ग्वाला रहती।

एक दिन जब राजूला रोज की तरह अपने मवेशीयों की ग्वाला थी। उस दिन मालूशाही भी राज्य के किसी काम से राम-गंगा के तट के गुजर रहे थे। अधिक गर्मी होने के कारण वो जल पीने के लिए राम-गंगा के तट पर रोके। जल की शीतलता से प्रशंन हो कर उनका मन राम-गंगा में स्नान करने को हुआ और अपने अंगरक्षकों को विष्राम करने का आदेश दे कर अकेले ही राम-गंगा के शीतल जल में स्नान करने के लिए नदी में उतर गये।

नदी में नहाते नहाते वो अपने स्थान से बहुत दूर निकल आये। जब वो स्नान करके निकले तो उन्होंने अपने आप को नये स्थान पर पाया। वो नदी से बाहर आ कर अपना वह स्थान ढूंढने लगे जहा पर उन्होंने अपने वस्त्र रखे थे। उन्हें दूर दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था। यह तक उनके अंगरक्षक तक नहीं दिख रहे थे।

मालूशाही अपने भीगे वस्त्रों मे ही नदी किनारे अपनी सेना और वस्त्रो की खोज मे भटकने लगे। मालूशाही थोड़े परेशान हो गये थे और उन के समझ में कुछ नही आ रहा था। तभी उनके कानो में एक मधुर आवाज पड़ी। वो आवाज राजूला की थी जो अपने मवेशीयों को गीत गाते हुए चारा करा रही थी। मालूशाही राजूला की मधूर शुरों की ओर खिचे चले गये। मालुशाही ने जैसे ही राजूला के देखा वे अपनी परेशानी को भूलकर राजूला के सुंदरता और उसके मधुर संगीत में खो गये। वही खड़े हो कर राजूला के गीत संगीत का आनदं लेने लगे। राजूला भी अपने कार्य में व्यस्थ थी। उसे भी मालूशाही के आने का आभास नहीं हुआ।

जब राजूला का संगीत समाप्त हुआ। और वो वापस जाने को हुई तो उसे अपने सम्मुख अंजान व्यक्ति को देख के गुस्से मे बोली – कोन हो तुम और यू गीले वस्त्र में किसी स्त्री से सम्मुख खड़े होने में तुमें लज्जा नहीं आती।

राजूला के कड़े शब्द सुनकर मालूशाही अपने होश में आये और कहने लगे – हे देवी मेरा नाम मालूशाही है, मै रास्ता भटक गया हू। आपके गीनों की मधूर संगीत सुनकर यहां आपकी सहयता लेने आया हू। ये सुनकर राजूला उनकी वेश भूशा देख कर कहती है- तुम ऐसी दशा में कैसे आये।

मालूशाही कहते है – मैं मार्ग से जाते समय गर्मी से हुई थकान को दूर करने का लिए नदी में स्नान करने को उतरा परंतु स्नान करते करते सायद में थोड़ी दूर आ गया। मेरे शूखे वस्त्र भी उसी स्थान पर रह गये है। इस लिए मुझे इस दशा मे ही आपके सम्मुख आना पड़ा। क्या आप मेरी सहायता कर सकती है। राजूला को मालूशाही की स्थती पर हंसी आने लगी। मालूशाही ने जब राजूला को मुस्काते हुए देखा तो। मालूशाही ने कहा – हे देवी किसी की मजबूरी पर हंसना सही नहीं होता। अगर हो सके तो मेरी सहायता करे।

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राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा
 

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