राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा


Writer:- सुन्दर जी Total page:-   12
Type:- प्रेम कहानी Page no.:- 5
Date:- 7/7/2016 1    
Description:- राजूला मालूशाही उत्तराखण्ड की प्रशिद्ध प्राचीन प्रेम कथा है। जिसे उत्तराखण्ड की कुमाँउनी और गढ़वाली भाषा के लोक गीतो में गाया जाता है। उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास को अपने में संजोय, ये कथा उत्तराखण्ड का हृदय है। यह कथा उत्तराखण्ड के बैराठ राज्य के कत्यूरी राज वंश के राजा मालूशाही और भोट राज्य के धनी व्यापारी सुनपती शौक्य की पुत्री राजूला शौक की अमर प्रेम कथा है। जिसे युगों युगों तक याद किया जायगा। किस तरहा से एक स्त्री ने अपना पती व्रता धर्म निभाया। और कैसे एक राजा ने अपने प्रेम के लिए राज्य पाठ त्याग के योगी बन जंगल जंगल विचिरण किया। आप सभी का स्वागत है इस रोचक प्रेम कथा में।


Page Number - 5

मालूशाही कहते है – मैं मार्ग से जाते समय गर्मी से हुई थकान को दूर करने का लिए नदी में स्नान करने को उतरा परंतु स्नान करते करते सायद में थोड़ी दूर आ गया। मेरे शूखे वस्त्र भी उसी स्थान पर रह गये है। इस लिए मुझे इस दशा मे ही आपके सम्मुख आना पड़ा। क्या आप मेरी सहायता कर सकती है। राजूला को मालूशाही की स्थती पर हंसी आने लगी। मालूशाही ने जब राजूला को मुस्काते हुए देखा तो। मालूशाही ने कहा – हे देवी किसी की मजबूरी पर हंसना सही नहीं होता। अगर हो सके तो मेरी सहायता करे।

राजूला पहले कुछ सोचती है पर फिर मालूशाही की सहायता करने को तैयार हो जाती है। मालूशाही अपने उस स्थान के बारे में बताते है और फिर मालूशाही और राजूला दोनो साथ मे वो स्थान ढूंढ ते है। अपने वस्त्र पा कर मालूशाही बहुत खुश होते है, और राजूला को धन्यवाद कह के चल देते है।

आगे जा के मालूशाही अपने अंगरक्षकों के साथ अपने कार्य के लिए निकल पड़ते है। परंतु पूरे मार्ग वो राजूला से हुई बातों का ही विचार करते रहते है। उधर राजूला भी रात भर मालूशाही का ही विचार कर रही थी।

मालूशाही भी रात भर राजूला के विचार में अपने महल मे यहा से वहा घुमता रह। दोनो ही जाने अंजाने मे एक दूसरे के प्रती आस्कत हो गये। अगली सुबह होते ही मालूशाही फिर से राजूला से मिलने के लिए अकेले निकल गये। राजूला भी रोज की तरह अपने मवेशीयों के साथ बैठे बैठे मालूशाही के बारे मे ही सोच रही थी। की तभी मालूशाही फिर से राजूला के पास पहुच गये। उन्हें देख कर राजूला को पहले तो प्रशन्नता हुई पर बीना प्रयोजन मालूशाही के वहा होने पर थोड़ा गुस्से में बोली – अब किस कारण से आना हुआ आपका।

यह प्रश्न सुनकर मालूशाही को कोई उत्तर नहीं सुझा तो मालूशाही ने कहा – हे देवी कल आपने मेरी बहुत सहायता की परंतु मैं आपका नाम ही पूछना भूल गया। सारी रात मैं यही सोचता रहा कि मेरी सहायता करने वाली सुंदर स्त्री का नाम जरूर पता होना चाहिए। इसलिए मैं आपका नाम जानने के लिए पुनः यह आया हु।

यह सुनकर राजूला पहले तो मालूशाही को प्रश्नचिन्ह के साथ देखती है पर फिर मुस्कुरा के कहती है। नाम जानने के बाद तो आप दोबारा यहा नहीं आओगे ना। मालूशाही कहता है – शायद ।

राजूला कहती है- मेरा नाम राजूला शौंक है। मैं भौट(भूटान) राज्य के व्यापारी सुनपति शौंक की पुत्री हु। हम यहा बौराठ राज्य में व्यपार करने के लिए आये है। और इसी तरह राजूला और मालूशाही बातों में व्यस्थ हो जाते है। रोज दोनो मिलते और देर तक वार्ता करते।

शीत ऋतु का अंत के साथ बसंत ऋतु का आगमन होने को था। सुनपति शौक कहता है हे पुत्री हमें यह बहुत समय हो गया है। जल्द ही वसंत ऋतु का अगमन हो जायेगा। इसलिए हमें अब अपने राज्य चले जाना चाहिए। यह सुन कर राजूला चिन्तित हो जाती है। राजूला मालूशाही से दूर नहीं जाना चाहती थी।

जब मालूशाही राजूला से मिलने आता है। तो राजूला उसे सारे बात बताती है। की आब वो और दिन यह नहीं रुक सकती है। यह सुन कर मालूशाही कहता है - राजूला मैं तूम्हारे बिना कैसे रहुगां। राजूला कहती है तुम भी हमारे साथ हमारे राज्य चलो वही कोई काम शुरू कर लेना।

यह सुन कर मालूशाही कहता है- राजूला मुझे माफ करना मैं तुम्हें ये नहीं बताया की मैं बैराठ राज्य का राजा हू। मुझे लगा अगर मैने तूम्हे बताया तो शायद तुम मुझसे बात न करो। मैं तुमसे दूर नहीं जाना चाहता। परंतु मैं अपना राज्य छोड़ के भी इतने दूर नहीं जा सकता। परंतु एक रास्ता है। अगले वर्ष शीत ऋतु में बागनाथ जी के मंदिर के उत्तरैनी कौतीक मैं हम मिलेगें और बागनाथ जी के मंदिर मे ही हम विवाह करेगें। तब तक तुम्हे अपने माता पिता के साथ ही रहना होगा। मैं उत्तरैनी कौतीक में तुम्से मिलने जरूर आऊगां। यह सुन के राजूला उदास हो जाती है। अपना वचन जरूर पूरा करना, यह कह कर राजूला मालूशाही से विदा ले कर अपने पिता के साथ वापस अपने घर आ जाती है।

परंतु राजूला का मन अब किसी कार्य में नहीं लगता है। वो दिन रात मालूशाही के विचार मे ही खोई रहती थी। इधर मालूशाही भी राजूला की यादों में खोय रहते थे। राज्य के कार्यो में भी रुची नहीं ले रहे थे।

यूहीं दिन गुजरते रहे। और वर्षा ऋतु आयी और आ के चली गयी। राजूला मालूशाही का इंतजार करती रही। इधर मालूशाही की माँ का स्वास्थ ठिक न होने के कारण मालूशाही अपनी माता के उपचार में व्यस्थ रहने लगा। उधर राजूला जल्दी से शीत ऋतु के आने का इंतजार कर रही थी।

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राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा
 

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