राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा


Writer:- सुन्दर जी Total page:-   12
Type:- प्रेम कहानी Page no.:- 9
Date:- 7/7/2016 1    
Description:- राजूला मालूशाही उत्तराखण्ड की प्रशिद्ध प्राचीन प्रेम कथा है। जिसे उत्तराखण्ड की कुमाँउनी और गढ़वाली भाषा के लोक गीतो में गाया जाता है। उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास को अपने में संजोय, ये कथा उत्तराखण्ड का हृदय है। यह कथा उत्तराखण्ड के बैराठ राज्य के कत्यूरी राज वंश के राजा मालूशाही और भोट राज्य के धनी व्यापारी सुनपती शौक्य की पुत्री राजूला शौक की अमर प्रेम कथा है। जिसे युगों युगों तक याद किया जायगा। किस तरहा से एक स्त्री ने अपना पती व्रता धर्म निभाया। और कैसे एक राजा ने अपने प्रेम के लिए राज्य पाठ त्याग के योगी बन जंगल जंगल विचिरण किया। आप सभी का स्वागत है इस रोचक प्रेम कथा में।


Page Number - 9

राजूला का पत्र पढ़ कर मालूशाही को बहूत दूखः हुआ। राजूला इतनी दूर उससे मिलने आ गयी और वो सोता ही रह गया। मालूशाही तुरंत अपनी माता के पास आज्ञा लेने जाता है। मालूशाही तुरंत पूरी सेना के साथ भोट पर आक्रमण कर राजूला को अपने राज्य ले कर आने की रण नीती बनाता है। परंतु मालूशाही की माँ रानी धर्मा देवी कहती है। पुत्र तू जानता नहीं है। भोट राज्य अपने जहरीले बिष के लिए प्रसिद्ध है। तेरी पूरी सेना भी भोट के बिष का सामना नहीं कर सकती।

तू भोट जाने की बात अपने दिल से निकाल दे। तु इक्लौता पुत्र है और तूझ पर ही पूरै बैराठ की जिम्मेदारी है। अच्छा राजा वो ही है जो अपने कर्तव्य को पहचाने। राजूला का विवाह भोट के राजा से हो रहा है तो तुम उसके लिए परेशान क्यों हो रहे हो।

मालूशाही कहता है। माता आप तो जानती है भोट राज्य में न तो अच्छी फसल होती है। और वहा का जंगल भी बहुत घना है। वहा का जीवन आसान नहीं है मेरी राजूला जैसी कोमल सुन्दरी वहा अपना सारा जीवन कैसे बितायेगी। मुझे उसे लेने जाना ही होगा। वो पूरा जीवन मेरे आने की राह देखेगी। परंतु रानी धर्मा देवी मालूशाही को भोट जाने की आज्ञा बिल्कुल नहीं देती है।

माँ की आज्ञा न मिलने से दूखी राजा को कोई मार्ग नहीं सूझता है। वो बहुत परेशान रहने लगता है। तभी राजा को अपने कत्यूरी राज वंश के गुरू बाबा गोरखनाथ का ध्यान आता है। राजा अपनी राजूला के पास जाने के लिए अपने गूरू गोरखनाथ की शरण मे चले जाते है।

राजा मालूशाही बाबा गोरखनाथ के पास जा के कहते है। हे गुरू देव मेरी माता ने मुझे भोट जाने की आज्ञा नहीं दी है। और मेरा भोट जाना अत्यंत जरूरी है। मेरी व्यथा सुनो और कोई हल बताओ। बाबा गोरखनाथ जी राजा की बात सुन कर कहते है। हे राजन आप राजा हो आप पर पूरे राज्य की जिम्मेदारी है। आप एक स्त्री के मोह में अपनी जान दाव पे नहीं लगा सकते। इस पर राजा कहता है। राजूला के बिना भी अब मेरा जीवन संभव नहीं है।

बाबा- हे राजन तुम राजा हो, तुम भोट राज्य के बिष से जीत नहीं सकते और रही राजूला के मोह की तो मैं तुम्हे राजूला की जीवंत मूर्ति अपने यज्ञ से उत्पन्न कर के दे देता हू । आप पूरे जीवन उस मूर्ती से अपना मोह व्यक्त कर सकते है।

मालूशाही- हे गूरू देव मैं भी कोई कमजोर पुरूष नहीं हू। मुझ में कत्यूरी वंश का खून है। और हजारों लोगों से अकेले यूद्ध करने में शक्षम हू। मूझे राजूला ही चाहिए। नहीं तो मैं यही आपके चरणों में ही अपनी जान त्याग दूंगा। मुझे ये राज पाठ कुछ नहीं चाहिए। मुझे अपना दिया वचन निभाना है। बस आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिऐ।

बाबा- हे राजन ठीक है मैं आप के प्रेम की गहराई को समझते हुए आप को एक अवशर अवश्य देना चाहता हू।

पहले आप एक जोगी को रूप धारण कर मेरी दीक्षा लीजिए उसके बाद ही हम देखेंगे आप क्या कर सकते है।

राजा मालूशाही ने खुशी से राजा के वस्त्र त्याग के शाधू का वेष धारण किया। एक राजा अपने प्रेम को पाने का लिए अपने फूलो से सजे तख्त को छोड़ के काँटों के बिस्तर पर लेटने को तैयार हो गया।

छह माह की कठिन शिक्षा पूर्ण की । शिक्षा मे बाबा ने राजा को बिष से अपनी और अपनी सेना की रक्षा करने का उपाय भी सिखाये। शिक्षा पूरी होने पर राजा ने बाबा गोरखनाथ जी से उनकी गूरू दक्षणा देने के लिए प्रश्न पूछा।

बाबा ने कहा हे राजन मुझे कोई दक्षिणा नहीं चाहिए । पर अगर तुम कुछ करना ही चाहते हो तो जाओ अपनी माँ से भीक्षा ले के आओ।

राजा योगी का रूप धर के अपनी माता के पास जाता है। मालूशाही अपने महल मे जा के भीक्षा मांगता है। उस के महल मे कोई भी उसे पहचान नहीं पाता है। सेवकों के भीक्षा देने पर मालूशाही कहता है। नहीं मूझे तो रानी धर्मा देवी से ही भीक्षा लेनी है।

माता धर्मा देवी को सूचना दी जाती है। तो माता धर्मा देवी कहती है। योगी राज के भोजन को प्रबन्ध करो। बहुत दिनो बाद कोई योगी माहराज आये है। हम उन्हें अपने हातो से भोजन करा के ही दान देगें।

रानी धर्मा देवी ने योगी राज को भोजन अपने हाथो से लगाया और उन्हें भोजन ग्रहण करने का अनुरोध किया। योगी राज भोजन के लिए बैठ गये। और जैसे ही भोजन प्रारम्भ किया माता ने कहा- पूत्र तुमने मेरी बात नहीं मानी और और आज योगी का रूप धारण करके मेरे पास आये हो। मैं तुम्हारी इस साधना को विफल नहीं करूगीं परंतु अपना ध्यान रखना और राजूला को जल्दी वापस ले के आना। मेरा आशिर्वाद तुम्हारे साथ है।

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राजूला – मालूशाही की अमर प्रेम कथा
 

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